JAGJIT SINGH

  • GHAZALS, JAVED AKHTAR , GULZAR

शनिवार, 4 मार्च 2023

जैसे खुशबू गुलों की ,फ़ज़ा में बिखर जाती है।वैसे आदत भी आदमी की,असर लाती है।बहार ओ खिजां में भी, मुस्कुराता है वो गुल।जिस पर 'उस' बागबान की नज़र ठहर जाती है।• गुल : फूल। फ़ज़ा : वातावरण• उस : खुदा, ईश्वर• खिजां : पतझड़। बागबान: माली

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