मेरे गीत, मेरी ग़ज़लें
JAGJIT SINGH
GHAZALS, JAVED AKHTAR , GULZAR
सोमवार, 17 मार्च 2025
तबस्सुम
तमन्ना यही है कि,
हर लब पर तबस्सुम हो।
न कोई तन्हा हो,
न कोई गुमसुम हो।
सिर्फ हम ही हम हो हर तरफ़।
न कोई मैं हो, न कोई तुम हो।
शनिवार, 8 मार्च 2025
सहरा कभी गुलज़ार नहीं होगा
हर बार यही सोचा,
अब नहीं होगा।
जो हुआ इस बार,
इस बार नहीं होगा।
किसी से उम्मीद रखना,
अच्छा नहीं होता।
पतझड़ का मौसम,
कभी बहार नहीं होगा।
सहरा में दूर तलक,
पानी का कतरा नज़र नहीं आता।
कितना भी बरस जाए यहां सावन,
सहरा कभी गुल -ए -गुलज़ार नहीं होगा।
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