JAGJIT SINGH
- GHAZALS, JAVED AKHTAR , GULZAR
अपने हिस्से में तो, खामोशियाँ ही आई हैं।कोशिश हमने भी की, खामोश फिर भी रह न सके।कहने वाले तो कह गए, उन्हें जो कहना था।कोशिश हमने भी की, पर होठ फिर भी हिल न सके।मुख़्तसर जिंदगी, क्यों ग़म में गुजारें इसको?अश्कों को पी लिया, कुछ बह गए,कुछ बह न सके।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें