ये मात्र एक शब्द नहीं बल्की जीवन का सार है।
एक बच्चे के लिए तो ये सारा संसार है।
एक "माँ" ही तो है जो शब्दों से परे ,
चेहरे को भावों को पढ़ना जानती है।
नौनिहाल के रुदन के रूपों को, अर्थ देना जानती है।
खुद गीले में ठिठुरकर, कलेजे के टुकड़े को ,
परियों की नगरी में घुमाना जानती है।
ये "माँ" ही तो है जो 'भूख नहीं' कहकर,
अपना निवाला बच्चों को देना जानती है।
ये "माँ" ही तो है जो काला टीका लगाकर,
बुरी नज़र से बचाना जानती है।
ये "माँ" ही तो है जो बच्चे की छोटी सी सिसकार पर,
रात - रात भर जागना जानती है।
सारा संसार रूठ जाए , चाहे हर सुख छूट जाए,
लेकिन ये "माँ" ही तो है जो अपने बच्चों से,
रूठना ही नहीं जानती है।
इसीलिए धरती को भी शायद माँ ही कहते हैं,
जो सबकुछ सहकर, कुछ लेना नहीं, सिर्फ देना जानती है।
.......... Surendra Kumar..........
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