कोई समझे कि नहीं, दिल की बात कहने दो।
कल थे जिनके लिए हम रौनक ए महफिल की तरह।
आज हम हो गए उनके लिए, पत्थर की तरह।
उनकी आंखों में न आसूं, कभी आने पाएं।
अश्क आंखों से मेरी बहते हैं तो बहने दो।
हमने अपनों के लिए, ग़म हैं बेशुमार सहे।
वक्त बदला तो ये अपने, मेरे अपने न रहे।
कोई पागल कहे, मुझको तो आज कहने दो।
अपने,अपने नहीं गैरों की बात रहने दो....
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें