शास्त्रों में उल्लिखित है:
संचित कर्मों के अनुसार ही मनुष्य का सांसारिक स्वरूप निर्धारित होता है। जन्म जन्मांतरों के संचित कर्मों के अनुसार ही मनुष्य शुभ-अशुभ फल भोगता है। परमात्मा दयालु है इसलिए शास्त्रों में यह भी उल्लिखित हैं कि मनुष्य अपने सद्कर्मों के द्वारा अशुभ फलों को न्यून भी कर सकता है। किंतु अहं के वशीभूत मनुष्य इस शाश्वत सत्य को जानते हुए भी सद्कर्मों की ओर प्रवृत्त नहीं होता।
इसी का नाम कलियुग है।
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