चार दिन ही तो मिले हैं जिंदगानी के,
इन्हे नफरतों में यूं तो न ज़ाया कीजै।
भूल जाओगे अपना हर ग़म,
कभी 'ख़ुद' से भी बाहर आया कीजै।
याद रखती उन्हीं को दुनिया है,
जो जलके रोशनी लुटाते हैं।
चराग बन न सको गर तो कोई बात नहीं,
जो जल रहा है उसे तो न बुझाया कीजै।
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