JAGJIT SINGH
- GHAZALS, JAVED AKHTAR , GULZAR
मैंने कुछ नहीं माँगा, बिन माँगे ही मुझको,बहुत कुछ मिल गया।जहां उम्मीद नहीं थी,महज़ एक गुल की,वहां गुलिस्तां सारा मिल गया।जी रहा था खुद में, दूर अपनों से होकर।जब से छोड़ा है खुद को,तबसे अपनों से मैं जैसे मिल गया।
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