JAGJIT SINGH

  • GHAZALS, JAVED AKHTAR , GULZAR

शुक्रवार, 5 मई 2023

हर शख्स हो हम सा , ये ज़रूरी तो नहीं,इसी उम्मीद में हर शख़्स तन्हा रह गया। इजाज़त महज़ कुछ लोगों को ही थी, मगर हर कोई हमसे, जाने क्या-क्या कह गया। पूछा गुलों से हमने,,तुम्हे कांटों से डर नहीं लगता? मेरे सवाल पर हर गुल,सिर्फ हँसकर रह गया। धार तो बहुत तेज़ होती है, ज़िंदगी के दरिया की। जो हँसा वही रह गया, और जो रोया, यूं ही बह गया।

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